आज आर्कोट के नवाब, या कर्नाटक के नवाब, नवाब मुहम्मद अब्दुल अली हैं।

 आर्कोट के नवाबों की पूरी कहानी और वर्तमान नवाब को आज भी यह उपाधि क्यों दी जाती है, इसका विवरण इस प्रकार है:

आर्कोट के नवाबों की पूरी कहानी

1. नवाबियत की शुरुआत (17वीं शताब्दी):

आरंभ: आर्कोट के नवाबों का शासन लगभग 1690 से 1855 तक दक्षिण भारत के कर्नाटक क्षेत्र (Carnatic region) पर था। उन्हें "कर्नाटक के नवाब" भी कहा जाता था।

मुगल प्रतिनिधि: मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब ने मराठों के खिलाफ़ जीत के लिए ज़ुल्फ़िकार खान नुसरत जंग को 1692 में कर्नाटक का पहला सूबेदार (गवर्नर) नियुक्त किया, जिसकी सीट (राजधानी) शुरू में जिंजी थी, जिसे बाद में आर्कोट ले जाया गया। वे कानूनी तौर पर हैदराबाद के निज़ाम के अधीन थे।


2. स्वतंत्रता और सत्ता का उत्कर्ष (18वीं शताब्दी):

स्वतंत्रता: मुगल साम्राज्य के कमज़ोर होने पर, नवाब सादतुल्ला खान प्रथम (1710-1732) ने खुद को लगभग स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया और आर्कोट को अपनी राजधानी बनाया।

कर्नाटक युद्ध: 18वीं शताब्दी में, नवाबों की शक्ति को फ्रांसीसी और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी दोनों से चुनौती मिली। नवाबों के उत्तराधिकार को लेकर दोनों यूरोपीय शक्तियों के बीच कर्नाटक युद्ध हुए।

ब्रिटिश प्रभाव: रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में अंग्रेजों ने आर्कोट की घेराबंदी में जीत हासिल की, जिससे दक्षिण भारत में उनकी सैन्य श्रेष्ठता स्थापित हुई।

वालजाह वंश: मुहम्मद अली खान वालाजाह (1749-1795) को ब्रिटिश समर्थन से नवाब बनाया गया।


3. शक्ति का पतन और ब्रिटिश नियंत्रण (19वीं शताब्दी):

संधि और अधिकार समर्पण: नवाबों ने बढ़ते कर्ज और सैन्य खर्चों के कारण धीरे-धीरे अपने अधिकार अंग्रेजों को सौंप दिए। 1801 की संधि के तहत, कर्नाटक क्षेत्र का पूरा नागरिक, सैन्य और राजस्व प्रशासन हमेशा के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी को हस्तांतरित कर दिया गया। इसके बाद नवाब केवल नाममात्र के शासक (Titular head) बनकर रह गए।

उपाधि का उन्मूलन (1855): 1855 में, 13वें नवाब गुलाम मुहम्मद ग़ौस खान की बिना किसी पुरुष वारिस के मृत्यु हो गई। उस समय के गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी ने 'डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स' (व्यपगत का सिद्धांत) के तहत नवाब की उपाधि और राज्य को पूरी तरह समाप्त कर दिया।


वर्तमान नवाब (राजकुमार) की स्थिति

राज्य समाप्त होने के बाद भी, यह वंश परंपरा जारी रही, लेकिन 'नवाब' की उपाधि बदल गई।


आज भी 'नवाब' (वास्तव में 'राजकुमार') क्यों कहा जाता है:

ब्रिटिश द्वारा उपाधि का पुनर्गठन (1867):

1855 में नवाब की उपाधि समाप्त होने के 12 साल बाद, दिवंगत नवाब के चाचा अज़ीम जाह ने नवाब के पद के लिए दावा किया।


ब्रिटिश सरकार ने 1867 में एक समझौता किया। उन्होंने 'नवाब' की पुरानी उपाधि बहाल नहीं की, बल्कि एक नई उपाधि 'हिज हाइनेस द प्रिंस ऑफ आर्कोट' (His Highness the Prince of Arcot) या 'अमीर-ए-आर्कोट' प्रदान की।

अज़ीम जाह को वंशानुगत आधार पर यह उपाधि, साथ ही राजनीतिक पेंशन (Political Pension) और चेन्नई में अमीर महल निवास के उपयोग का अधिकार प्रदान किया गया। यह उपाधि स्थायी रूप से (in perpetuity) दी गई थी।


भारत सरकार द्वारा निरंतर मान्यता:


1 विशेषाधिकार: भारत की स्वतंत्रता (1947) और रियासतों के विशेषाधिकारों (प्रिवी पर्स) के उन्मूलन (1971) के बावजूद, आर्कोट के राजकुमार का पद एक अद्वितीय अपवाद बना रहा।

2 कानूनी मान्यता: भारत सरकार ने ब्रिटिश शासन के दौरान की गई इस संधि को जारी रखने का फैसला किया।

3 वर्तमान स्थिति: नवाब मुहम्मद अब्दुल अली इस वंश के 8वें राजकुमार हैं। उन्हें भारत सरकार द्वारा नाममात्र के राजकुमार (Titular Prince) के रूप में मान्यता प्राप्त है।

4 मान्यता का उद्देश्य: यह उपाधि अब कोई राजनीतिक या शासकीय अधिकार नहीं रखती है, बल्कि इसे औपचारिक और सांस्कृतिक उद्देश्यों के लिए एक वंशानुगत सम्मान के रूप में मान्यता दी जाती है।

5 राजकीय दर्जा: उन्हें भारत सरकार की वरीयता क्रम (Order of Precedence) में एक राज्य कैबिनेट मंत्री के लगभग समकक्ष दर्जा प्राप्त है।

6 सुविधाएँ: उन्हें अभी भी राजनीतिक पेंशन मिलती है और चेन्नई में अमीर महल उनके आधिकारिक निवास के रूप में भारत सरकार द्वारा सेंट्रल पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (CPWD) के माध्यम से अनुरक्षित है।


संक्षेप में, आज नवाब मुहम्मद अब्दुल अली को नवाब कहने का कारण उनका ऐतिहासिक वंश और ब्रिटिश सरकार द्वारा 1867 में दी गई और भारत सरकार द्वारा जारी रखी गई 'प्रिंस ऑफ आर्कोट' की विशेष उपाधि है। वह एक शासक नवाब नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और सामुदायिक नेता के रूप में अपने पद को बरकरार रखते हैं।


महाराजा प्रवीर चन्द्र भंज देव || महाराजा प्रवीर चन्द्र भंज देव का जीवन और इंदिरा गांधी से उनके मतभेदों की कहानी बहुत दिलचस्प और दुखद है


महाराजा प्रवीर चन्द्र भंज देव का जीवन और इंदिरा गांधी से उनके मतभेदों की कहानी बहुत दिलचस्प और दुखद है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं।

प्रारंभिक जीवन और शासन

जन्म与विरासत: प्रवीर चंद्र भंज देव का जन्म 1929 में हुआ था। वह बस्तर रियासत के शासक, महाराजा रुद्र प्रताप देव के पुत्र थे। हैहयवंशी काकतीय वंश के इस ख़ानदान ने सदियों तक बस्तर पर शासन किया था।
शिक्षा: उनकी शिक्षा-दीक्षा दार्जिलिंग के प्रतिष्ठित सेंट पॉल स्कूल में हुई थी।
गद्दी पर बैठना: 1936 में, जब प्रवीर सिर्फ 7 साल के थे, उनके पिता की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई। इसके बाद उन्हें महाराजा घोषित किया गया, लेकिन नाबालिग होने के कारण एक अंग्रेज अधिकारी की अध्यक्षता में प्रशासनिक परिषद ने शासन चलाया। 1947 में 18 साल के होने पर उन्होंने पूर्ण शासन की बागडोर संभाली।

भारत के साथ विलय और बाद की स्थिति

1948 में, महाराजा प्रवीर ने स्वेच्छा से बस्तर का भारतीय संघ में विलय कर दिया। बस्तर मध्य प्रदेश राज्य का एक हिस्सा बन गया और महाराजा को 'प्रिवी पर्स' (राज्यभत्ता) मिलने लगा।

हालाँकि, विलय के बाद का दौर उनके लिए संतोषजनक नहीं रहा। उन्हें लगता था कि:

1. आदिवासी हितों की अनदेखी: भारत सरकार और मध्य प्रदेश की सरकार बस्तर के आदिवासियों की समस्याओं और उनकी अनूठी संस्कृति को ठीक से नहीं समझ रही है।
2. भ्रष्टाचार: उनका मानना था कि सरकारी अधिकारी आदिवासियों का शोषण कर रहे हैं और विकास के फंड का दुरुपयोग हो रहा है।
3. निजी विवाद: उन्हें अपनी 'प्रिवी पर्स' बंद होने और अपनी निजी संपत्ति (जंगल, भूमि) को लेकर सरकार के साथ विवाद हो गया।

इंदिरा गांधी से 'दुश्मनी' का कारण

यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि प्रवीर की 'दुश्मनी' सीधे तौर पर इंदिरा गांधी के व्यक्ति से नहीं, बल्कि उस समय की केंद्र सरकार और उनकी नीतियों से थी। इंदिरा गांधी उस समय देश की प्रधानमंत्री थीं, इसलिए स्वाभाविक था कि उनकी नीतियों के विरोध का केंद्र वही बनीं।

मतभेद के प्रमुख बिंदु:

आदिवासियों के मसीहा: प्रवीर खुद को आदिवासियों का रक्षक मानते थे। वह लगातार सरकार पर आदिवासियों के अधिकारों की अनदेखी करने और उनकी ज़मीन हड़पने का आरोप लगाते रहे।

जनसमर्थन की ताकत: आदिवासी समुदाय उन्हें भगवान की तरह पूजता था। यह जनसमर्थन सरकार के लिए चिंता का विषय बन गया। सरकार इसे "अंधविश्वास" मानती थी, लेकिन प्रवीर के लिए यह उनकी वैधता का आधार था।

सीधी भिड़ंत: प्रवीर ने आदिवासियों की शिकायतों को लेकरी दिल्ली तक मार्च किया और सरकार के खिलाफ जमकर बोले। इससे स्थानीय प्रशासन और केंद्र सरकार के साथ उनका टकराव बढ़ता चला गया।

राजनीतिक संघर्ष: सरकार का मानना था कि प्रवीर अपने निजी हितों (जैसे जमीन के मसले) के लिए आदिवासियों को भड़का रहे हैं और सरकार के खिलाफ असंतोष पैदा कर रहे हैं।

दुखद अंत: 25 मार्च 1966 की घटना
यह टकराव अपने चरम पर 25 मार्च 1966 को पहुँच गया।

1.  उस दिन महाराजा प्रवीर अपने महल में हज़ारों आदिवासियों के सामने भाषण दे रहे थे।

2.  स्थानीय प्रशासन को खबर मिली कि आदिवासी हिंसक हो सकते हैं (यह बात आज भी विवादित है)।

3.  पुलिस ने महल को घेर लिया और महाराजा को गिरफ्तार करने का प्रयास किया।

4.  इसके बाद क्या हुआ, यह आज तक एक रहस्य है। कहा जाता है कि पुलिस ने भीड़ पर गोली चलाई और भगदड़ मच गई।

5.  इस गोलीकांड में (महाराजा प्रवीर चंद्र भंज देव, उनकी माँ महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी, और उनके एक छोटे भाई सहित कम से कम 12 लोग मारे गए।) कुछ रिपोर्ट्स में मरने वालों की संख्या बहुत अधिक बताई जाती है।

निष्कर्ष
महाराजा प्रवीर और इंदिरा गांधी/केंद्र सरकार के बीच की "दुश्मनी" मूलतः सत्ता, संसाधनों और आदिवासियों के नेतृत्व को लेकर एक टकराव थी। प्रवीर एक ऐसे traditional शासक थे जो अपनी प्रजा के हक में खड़े थे, जबकि नई लोकतांत्रिक सरकार केन्द्रीकृत नियंत्रण और एकरूपता पर जोर दे रही थी।

आज भी बस्तर के आदिवासी इलाकों में महाराजा प्रवीर को एक शहीद और देवतुल्य व्यक्ति के रूप में पूजा जाता है। 25 मार्च 1966 की घटना बस्तर के इतिहास का एक काले अध्याय के रूप में याद की जाती है, जो एक राजा और उसकी प्रजा के बीच के अटूट रिश्ते का, लेकिन साथ ही एक कठोर राजनीतिक टकराव का भी प्रतीक है।

प्रथस विश्व युद्ध के बाद शांति के लिए सम्मेलन ,Paris Peace Conference

प्रथम विश्व युद्ध के बाद पेरिस शांति सम्मेलन का आयोजन किया गया। यह सम्मेलन 18 जनवरी 1919 से 21 जनवरी 1920 तक पेरिस, फ्रांस में आयोजित हुआ, जिसमें 32 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन के मुख्य परिणाम और तत्व इस प्रकार थे:

1. पृष्ठभूमि और उद्देश्य

युद्ध की समाप्ति के बाद विजयी राष्ट्रों ( ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका, इटली, जापान) ने यूरोप और विश्व को पुनर्गठित करने, युद्ध के लिए जिम्मेदार देशों को दंडित करने और भविष्य में शांति सुनिश्चित करने के लिए इस सम्मेलन का आयोजन किया था।  

अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने  " चौदह सूत्री कार्यक्रम " प्रस्तुत किया, जिसमें राष्ट्रों के आत्मनिर्णय, निरस्त्रीकरण और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग पर जोर दिया गया। 

2. प्रमुख संधियाँ और प्रावधान

सम्मेलन ने पराजित केन्द्रीय शक्तियों के साथ अलग-अलग संधियाँ संपन्न कीं:  

वर्साय की संधि (28 जून 1919):  

जर्मनी:  यह जर्मनी के साथ हस्ताक्षरित सबसे महत्वपूर्ण संधि थी। इसमें जर्मनी को युद्ध का एकमात्र दोषी ठहराया गया और कठोर शर्तें लगाई गईं:  

प्रादेशिक क्षति: अलसेस-लोरेन फ्रांस को वापस कर दिया गया; जर्मन भूमि पोलैंड को दे दी गई; सार क्षेत्र 15 वर्षों के लिए अंतर्राष्ट्रीय नियंत्रण में रहा।  

सैन्य प्रतिबंध: सेना की संख्या 100,000 तक सीमित; वायु सेना और पनडुब्बियों पर प्रतिबंध; राइनलैंड का विसैन्यीकरण।  

क्षतिपूर्ति: 132 बिलियन स्वर्ण मार्क (आज लगभग 269 बिलियन डॉलर) का भारी जुर्माना।  

जर्मनी ने इस संधि को " अपमानजनक " माना , जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के लिए मंच तैयार कर दिया।  

अन्य संधियाँ:  

सेंट-जर्मेन की संधि (1919): ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य का विघटन; हंगरी, चेकोस्लोवाकिया आदि नए देश बने।  

ट्रायोन की संधि (1920): हंगरी की सीमाएं काट दी गईं, रोमानिया और यूगोस्लाविया को भूमि दे दी गई।  

सेव्रेस की संधि (1920): ओटोमन साम्राज्य का विभाजन; तुर्की को छोड़कर मध्य पूर्व में ब्रिटिश/फ्रांसीसी प्रभाव क्षेत्र की स्थापना।  

3. राष्ट्र संघ की स्थापना

विल्सन के कहने पर "10 जनवरी 1920" को राष्ट्र संघ की स्थापना की गई , जिसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण समाधान और सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करना था।

जर्मनी और रूस को शुरुआत में सदस्यता नहीं दी गई थी, जबकि अमेरिका भी कांग्रेस के विरोध के कारण इसमें शामिल नहीं हुआ। यही कमज़ोरी आगे चलकर इसकी असफलता का कारण बनी।  

4. आलोचनाएँ और दीर्घकालिक प्रभाव

जर्मनी का अपमान : संधियों को " बलपूर्वक थोपा गया" बताया गया। जर्मन प्रतिनिधियों को वर्सेल्स में कांटेदार तारों से घिरे एक होटल में रखा गया और उन्हें शर्तों पर बहस करने का अवसर नहीं दिया गया।  

यूरोप का पुनर्निर्माण: ओटोमन, रूसी और ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्यों के पतन के बाद, कई नए देशों का गठन हुआ (जैसे पोलैंड, यूगोस्लाविया), लेकिन उनके भीतर जातीय तनाव बना रहा।  

द्वितीय विश्व युद्ध की नींव: जर्मनी में आर्थिक संकट और राष्ट्रवादी आक्रोश ने हिटलर के उदय को बढ़ावा दिया। जर्मन सेना ने "पीठ में छुरा"(Stab-in-the-back) मिथक फैलाया, जिसमें दावा किया गया कि सेना युद्ध नहीं हारी, बल्कि राजनीतिक नेताओं ने उसे धोखा दिया ।

5. भारत और अन्य उपनिवेशों की लडाई में भूमिका   

भारत की अंग्रेजी सरकार ने मित्र देशों की ओर से 14 लाख भारतीय सैनिक भेजे, लेकिन पेरिस सम्मेलन में उसे स्वतंत्र प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। इससे उपनिवेशों में स्वतंत्रता आंदोलनों को बल मिला ।  

निष्कर्ष  

पेरिस शांति सम्मेलन ने ,आज की विश्व की राजनीतिक संरचना का आकार दिया, लेकिन इसकी पाबंदी की शर्तों, विजेताओं के बीच समझौतों और राष्ट्रवादी आकांक्षाओं की अनदेखी ने असंतोष पैदा किया। वर्साय की संधि विशेष रूप से विवादास्पद रही, जिसे इतिहासकार द्वितीय विश्व युद्ध का प्रमुख कारण मानते हैं । सम्मेलन की सबसे स्थायी विरासत राष्ट्र संघ की स्थापना थी, हालाँकि वह भविष्य के संघर्षों को रोकने में विफल रहा।

टी. एन. शेषन , टी. एन. शेषन (तिरुनेल्लई नारायण अय्यर शेषन) भारत के दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त

 टी. एन. शेषन (तिरुनेल्लई नारायण अय्यर शेषन) भारत के दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त (1990–1996) थे, जिन्हें भारतीय चुनाव प्रणाली में क्रांतिकारी सुधारों और निष्पक्ष लोकतंत्र की स्थापना के लिए याद किया जाता है। उनका जन्म 15 मई 1933 को केरल के पलक्कड़ जिले में हुआ था और निधन 10 नवंबर 2019 को चेन्नई में हुआ ।

प्रमुख जीवन परिचय

1. शिक्षा और प्रारंभिक करियर: मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से भौतिकी में स्नातक किया और कुछ समय वहाँ व्याख्याता रहे।

1955 में UPSC परीक्षा पास कर तमिलनाडु कैडर के आईएएस अधिकारी बने। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से लोक प्रशासन में मास्टर्स किया 

 प्रशासनिक सेवा में विभिन्न पद: मद्रास परिवहन निदेशक (1962), परमाणु ऊर्जा आयोग सचिव, कैबिनेट सचिव (1989), और पर्यावरण मंत्रालय सचिव ।

2. मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यकाल (1990–1996):

चुनाव सुधार : बोगस वोटिंग रोकने के लिए मतदाता पहचान पत्र अनिवार्य किया। धर्म, जाति या सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग पर प्रतिबंध लगाया ।

कड़े नियम: उम्मीदवारों के खर्चे की सीमा तय की, चुनावी घोषणाएँ रद्द कीं, और 14,000 से अधिक उम्मीदवारों को खाता जमा न करने पर अयोग्य ठहराया ।

विवादास्पद फैसले : 1992 में बिहार और पंजाब के चुनाव रद्द किए, तथा 1993 में सरकार से टकराव के बाद देशभर के चुनावों पर रोक लगा दी ।

3. नेताओं से टकराव:

प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के मंत्रियों को सार्वजनिक रूप से फटकार लगाई और कहा: "मैं कोई सहकारी समिति नहीं हूँ" ।

लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं को चुनाव स्थगित करके नाराज किया। लालू उन्हें "भैंसिया पे चढ़ाकर गंगाजी में हेला देंगे" कहते थे ।

एक प्रसिद्ध कथन: "राजनेता सिर्फ दो लोगों से डरते हैं—भगवान और शेषन" ।

4. प्रशासनिक अप्रोच:

मद्रास में परिवहन निदेशक रहते हुए खुद बस चलाकर यातायात समस्याएँ समझीं, कंडक्टर और मैकेनिक की भूमिका भी निभाई ।

पर्यावरण सचिव के रूप में टिहरी और सरदार सरोवर बाँध परियोजनाओं का विरोध किया ।

5. सेवानिवृत्ति के बाद:

1997 में राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा, लेकिन के. आर. नारायणन से हार गए।

1999 में कांग्रेस के टिकट पर गांधीनगर से लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ चुनाव हारे ।

पुस्तकें : द डीजेनरेशन ऑफ इंडिया और ए हर्ट फुल ऑफ बर्डन लिखीं ।

6. सम्मान: 1996 में रैमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित ।

विरासत

शेषन ने चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र और शक्तिशाली संस्था बनाया। उनके सुधारों ने भारतीय लोकतंत्र को पारदर्शिता दी, जिसके कारण आज भी उन्हें "चुनाव सुधारों का जनक" माना जाता है ।

स्नेहलता रेड्डी || स्नेहलता रेड्डी: इमरजेंसी के विरुद्ध एक ज्वलंत विरासत की संपूर्ण कहानी #स्नेहलतारेड्डी




प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि

स्नेहलता रेड्डी (1932-1977) का जन्म एक भारतीय ईसाई परिवार में हुआ था, लेकिन उनकी सांस्कृतिक जड़ें बहुस्तरीय थीं। उनकी नानी कश्मीरी ब्राह्मण थीं, जबकि दादा-दादी तमिल मुदलियार समुदाय से थे। अंग्रेजी में शिक्षित होने के बावजूद, कॉलेज के दौरान उन्होंने औपनिवेशिक प्रभावों को अस्वीकार करते हुए भारतीय पहचान अपनाई: केवल साड़ी पहनना, बिंदी लगाना, और संस्कृत नाम "स्नेहलता" का उपयोग करना शुरू किया । उन्होंने प्रसिद्ध गुरु कित्टप्पा पिल्लई से भरतनाट्यम सीखा और कन्नड़ फिल्मों में अभिनय करते हुए कई पुरस्कार जीते।

राजनीतिक सक्रियता और गिरफ्तारी का कारण

1975 में इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लागू किए जाने के बाद, स्नेहलता ने मानवाधिकार हनन के खिलाफ आवाज उठाई। उनकी समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस से गहरी मित्रता थी, जो सरकार विरोधी गतिविधियों के लिए "वांटेड" थे। सरकार का मानना था कि स्नेहलता उन्हें शरण दे रही थीं। 2 मई 1976 को उन्हें "डायनामाइट केस" के तहत गिरफ्तार कर लिया गया, जिसमें संसद भवन को उड़ाने का झूठा आरोप लगाया गया (आईपीसी धारा 120, 120A) । हालाँकि, ये आरोप कभी साबित नहीं हो सके।

जेल में अमानवीय यातनाएँ

बेंगलुरु सेंट्रल जेल में उन्हें जानबूझकर घोर यातनाएँ दी गईं:  

भौतिक स्थितियाँ : एक छोटी कोठरी में रखा गया, जहाँ शौच के लिए केवल एक छेद था। उन्हें सुरक्षाकर्मियों की निगाहों के सामने खुले में शौच करने को मजबूर किया जाता था ।  

स्वास्थ्य उपेक्षा : अस्थमा के रोगी होने के बावजूद, उन्हें दवा या बिस्तर नहीं दिया गया। वे फर्श पर सोती थीं, जिससे उनकी बीमारी बढ़ गई। दो बार वे अस्थमा अटैक से कोमा में चली गईं, लेकिन जेल अधिकारियों ने अस्पताल में भर्ती करने से इनकार कर दिया ।  

मनोवैज्ञानिक अत्याचार: अन्य कैदियों के सामने नग्न करके तलाशी ली जाती थी, जिसे उन्होंने अपनी डायरी में "मानवता के विरुद्ध" बताया ।

डायरी और प्रतिरोध की आवाज़

जेल में उन्होंने एक गुप्त डायरी लिखी, जिसमें महिला कैदियों के साथ हो रहे अत्याचारों को दर्ज किया:  

"जब किसी को सजा मिलती है, तो वह पर्याप्त है। क्या मानव शरीर को भी अपमानित करना जरूरी है? ... हमारा उद्देश्य मानवता को उच्चतर ले जाना होना चाहिए।"

इस डायरी के आधार पर 2019 में एक डॉक्यूमेंट्री बनी। उन्होंने जेल में भूख हड़ताल की और महिला बंदियों के खाने व पानी की स्थिति में सुधार कराया ।

मृत्यु और विरासत

8 महीने की यातना के बाद, 15 जनवरी 1977 को उन्हें पैरोल पर रिहा किया गया। लेकिन स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण 20 जनवरी 1977 को दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई । उनकी बेटी जुई कुमार रेड्डी ने बताया कि जेल प्रशासन ने उनके परिवार को मिलने से रोका, और रिहाई के समय वह शारीरिक रूप से टूट चुकी थीं ।

ऐतिहासिक प्रतिध्वनि

नेताओं की गवाही: अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी ने बताया कि वे जेल में स्नेहलता की चीखें सुनते थे । समाजवादी नेता मधु दंडवते ने अपनी किताब में इन यातनाओं का उल्लेख किया।  

राजनीतिक प्रतीक: 2023 में स्मृति ईरानी ने संसद में स्नेहलता का जिक्र करते हुए आपातकाल की क्रूरता को याद दिलाया ।  

महिला संघर्ष का प्रतीक: वे इमरजेंसी के दौरान सड़कों पर उतरीं महिलाओं के लिए प्रेरणा बनीं, जिन्होंने अखबारों का वितरण और जागरूकता अभियान चलाया ।

स्नेहलता रेड्डी की कहानी न केवल राजनीतिक दमन की याद दिलाती है, बल्कि उस "ज्वाला" की भी है जिसने अंधकार में भी मानव गरिमा की मशाल जलाए रखी। उनकी डायरी और बलिदान भारतीय लोकतंत्र की स्मृति में एक अमिट अध्याय हैं।

आज आर्कोट के नवाब, या कर्नाटक के नवाब, नवाब मुहम्मद अब्दुल अली हैं।

 आर्कोट के नवाबों की पूरी कहानी और वर्तमान नवाब को आज भी यह उपाधि क्यों दी जाती है, इसका विवरण इस प्रकार है: आर्कोट के नवाबों की पूरी कहानी ...